TELANG BABA तैलंग स्वामी

 

तैलंग स्वामी 






आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम जिलेमें एक गाँव है- होलिया. इस गाँव के जमींदार का नाम था- श्री नृसिंहधर. स्वभाव के उदारऔरप्रजा वत्सल. कट्टरब्रह्मण होने सेतीन समय गायत्री करतेथे. इनकीपत्नी विद्यावती देवी और भी धार्मिक प्रवृत्ति कीथी. व्रत उपवास और गृहदेवता शंकर कीपूजा में बहुत समयदेती थी. ले देकर उनके यहाँकोई संतान नहींथी. इस बातको लेकर मन में कमी थी. दोनों पति पत्नी और सब प्रकार से प्रसन्नथे. शादी के लगभगदस वर्ष बीत जाने के बादविद्यावती ने श्री नृसिंहसेकहा-“ आप दुसरा विवाहकरलीजिये.संतान होनेसे परिवार में ख़ुशी रहती है.“ श्री नृसिंह इस बात को नहींमाने.पत्नी के कई बारदोहराने परइतना ही बोले – सौतेली स्त्री घरमें आयेगी तो कलहहोगा.पत्नी बोली- मैं बहन कीतरहरख लुंगी. इस प्रकार समयऔर बीतता गया. और इसी के साथ विद्यावती कीमांग भी.अंत मेंश्री नृसिंहने दूसरी शादी कर ली. दूसरी पत्नी को गृहस्थी का सारा भारदेती हुई विद्यावती बोली-“ आज सेतुम्हेंही सब कुछ देखना है.मैंतुम्हारी सहायता करूं गी औरशेष समयमें पूजा करुँगी.“ कुछदिनों बाद नृसिंह के यहाँ चमत्कार हुआ. सन १६०७ ई. के प्रारम्भमें विद्यावती नेमाँबनाने का गौरव प्राप्तकिया. ये एक आश्चर्यजनक घटना थी.इतने समय बादख़ुशी हुई थी, खूब उत्सव किया गया और किसानों का लगान भी माफ़ किया गया.शिव भगवान् कीकृपा मान कर बालक का नाम माता की ओर सेरखा गया- शिवराम, और पिता नेपरम्परा सेरखा- तैलंग धर. कुछदिनों बाद नई पत्नी ने भी पुत्रको जन्म दिया.उसका नाम हुआ- श्री धर.पिता का स्नेहऔरमाँ की ममता पाकर दोनों बालक बड़े होते गए.औरदोनों बालक विपरीत स्वभाव के बनते गए.तैलंग धरअपने सहपाठियों से दूर नजानेकिस दुनिया में खोया रहता था.उसेभीड़ औरकोलाहल पसंदनहीं था.दूसरी ओर श्री धरघरमें चारों ओरदौड़ धुप औरउपद्रव करता था. जयेष्टपुत्रकीस्थिति देखकरनृसिंहचिंतित होते थे. ऐसी उम्र जहाँ बालक चंचल और उपद्रवी होते हैंवहीँ तैलंग धरशांत और अपने ही ध्यान में लींरहता था. बड़ा होनेपर नृसिंह ने लड़के के ब्याह कीसोची.इस बात कीसूचना पाकरतैलंग धर बोलेकि आप इस चिंता मेंन पड़े.मुझे ब्याहनहींकरना है. नृसिंहयहबात सुनकर अवाक् रहगए. वेबूढ़े होते जा रहेथे. जमींदारी का काम, परिवार कीदेखभाल, लगान वसूल करना आदिकौनकरेगा अगरज्येष्ठ पुत्रनहींकरेगा. वंश रक्षा का तर्क दिया गया.इस पर तैलंग धरबोले कि आप श्री धर का ब्याहकरदीजिये. विद्यावती ने समझाया पर माँ तो तैलंग धरबोले- मैं अविवाहित रहना चाहता हूँ. माँनेभी नृसिंहसे कहा- “ चलो उसेअपने रस्तेपर चलने दो. बचपनसेदेख रही हूँकि ये अलग सा है, जबमैं पूजा करनेबैठती थी तो ये भी ध्यान मेंबैठता था.मैं सोचती थी कि जैसे बालक करते हैं.आँख मूँदकर, कर रहा होगा. लेकिन मेरी धारणा गलत निकली.एक दिन विग्रहमेंसेतेज़ निकल करतैलंग मेंसमा गया.मैंडरगयी थी. एक दिन तो खिड़की सेदेखा कीशिवराम बाग़ में पीपल के नीचे आँखें मूँदकरबैठा है. ध्यान मेंलीं, और मैं डर गयी क्योंकि एक नाग फन फैलाकरशिवराम के पीछेथा.यह दृश्यदेखकर मैंभयसे चीखउठी.तुरंत गोपाल को भेजा परगोपाल ने कोई सांप नहींदेखा.बोला कि बड़े भैया केवल आँखबंदकरके बैठे हैं. तैलंग से पूछा तो वह चुप रहा.मुझे तो ऐसा लगता हैकि हमारे घरमें किसी संत नेजन्म लिया है.“ नृसिंहइस बात पर मन ही मन मुस्कुरा उठे औरअपनी पत्नी का भ्रम मान लिया.उन्होंनेतैलंग परनजर रखनी शुरूकी. एक दिन उन्होंने भी नाग को तैलंग के सर परफन फैलाए देखा.उनके होश गम हो गए. तैलंग अचल ध्यान में लीनथा. तब उन्हेंभी विश्वास हो गया. समयगुजरता गया.इस बीचनृसिंग कीमृत्यु हो गयी.श्रीधर नेजमींदारी की जिम्मेदारी उठा ली थी.तैलंग अपनी दोनों माँओंकीसेवा औरध्यान में रम गया.नृसिंहके निधनके दस वर्ष के बादविद्यावती भी चल बसीं. उनके चल बसनेके बाद तैलंग पूर्णनिर्मोही हो गया.जहाँ माँ का अंतिम संस्कारहुआ था वहीँ श्मसान मेंरहने लगा.भस्म सर्वांग में पोतकरबस ध्यान मग्न रहता. सौतेली माँ औरभाई ने आकर बहुत समझाया पर तैलंग नहीं माना. केवल इतना बोला-“ तुम पिता कीसंपती और परिवार कीदेखभाल करो.“ बड़ा आग्रहकरने परश्रीधर को एक कुटिया वहीँ श्मसान में बनाने को कहा. औरदैनिक भोजन का प्रबंधकरदिया. तैलंग धर अब तक जो कर रहेथेअपनी अंतर प्रेरणा से कर रहे थे.एक अरसे बाद१६७५ ई. मेंएक योगीराजहोलिया गाँव कीश्मसान भूमि मेंआये औरसीधेतैलंग कीकुटिया में जाकरबोले-<> माँद्वारा प्रदत्त नाम केवल माँकरती थी, सौतेली माँ या कोई अन्यभी नहींकरता था. ये ऐसा किसनेपुकारा, सोचकर बाहरआये. सामने एक संतखड़े थे, अपूर्व तेज़ निकल रहा था.उनके आगेतैलंग का मस्तक अपने आप झुक गया. उसे अपने स्वप्न मेंदेखी कुछ घटनाएंयादआ गयी. उन्हेंलगा- कहीं ये संत उनके गुरु नहो, सोचकरपुनः प्रणाम किया. आगंतुक स्वामी का नाम भागीरथस्वामी था. आप पटियाला सेआये थे.दक्षिणके विभिन्नतीर्थ स्थलों का दर्शनहेतु था. इतनी देरमें खाना आ गया, दोनों संतों ने प्रसाद लगाया. दोनों मेंबातें होने लगी. बातचीतमें भागीरथस्वामी बोले.-“ कुछ दिन यहाँ विश्राम करनेके बादगिरनारहोते पुष्करजाने का विचार है. “ तैलंग धर बोले-“ महाराज आपको आपत्ति न हो तो मैं आपके साथचलूँ. आपसे उपदेश सुनूंगा और आपकीसेवा करूं गा.“ भागीरथ स्वामी तैलंग धरको साथ लेकरविभिन्नतीर्थों का भ्रमणकरतेहुएपुष्करराज पहुंचे.इस बीचउन्होंनेतैलंग के अन्दर कीशक्ति को पहचान लिया था. उन्हेंसमझते देर नहीं लगी कि तैलंग में सब कुछ हैकेवल प्रक्रिया समझानी है.अब भागीरथ स्वामी तैलंग धरको नित्ययोग कीक्रियाएंबताने लगे. होलिया गाँव से पुष्कर आनेमें ६वर्ष लगेथे. इन दिनों तैलंग धर ७७ वर्ष कीउम्र पार करचुके थे. आखिरएक दिन वो शुभघडी आ ही गयी जिसकीप्रतीक्षा एक अरसेसे तैलंग धरकर रहेथे.भागीरथस्वामी ने कहा- “तैलंग, कल तेरे को दीक्षा दूँगा.“ पुष्कर सरोवर में स्नान करने के बादतैलंग धर आसनपर बैठ गए. सारी क्रियायों के बादभागीरथस्वामी ने उन्हेंबीजमंत्र दिया. इसके बादबोले-“अब तक तुम्हे योग कीप्रक्रियाएं बताता रहा.उसका अभ्यास करते रहना.अपने गुरु प्रदत्त उपाधितुम्हेंदेरहा हूँक्योंकि परम्परा के अनुसार शिष्यको गुरु की शाखा कीउपाधिग्रहणकरनी पड़ती है.आजसे तुम तैलंग धर या शिवराम के नाम से नहीं, बल्कि <> के नाम से जाने जाओगे.“ कुछविद्वान्कहतेहैं कि उनका नाम <> रखा गया.चाहे जो भी हो…….. नामकरण के बादभागीरथ स्वामी ने गजाननसरस्वती को अष्ट सिद्धी प्रदान करीं. अणिमा, लघिमा, महिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, वशित्व, इशीतृत्व, यत्रकामावसायावित्व बाबा इस प्रकारदीक्षा लेनेके बादगुरुदेवकीसेवा करतेहुए और दस वर्षतक पुष्करमें रहे. गुरुदेव भागीरथस्वामी ने देहत्याग कर दिया. गुरुदेव के ब्रह्मलीन होने के बादआप तीर्थयात्रा को निकल पड़े. इस समयआपकीउम ८८वर्ष की थी. सन१६६५ ई. मेंआप पुष्करसेचलकरविभिन्नतीर्थस्थलों कीयात्रा करतेहुएरामेश्वरम आये. यहाँ देश के भिन्न भिन्न भागों से महात्मा लोग आये हुए थे.मेले मेंहोलिया गाँव के निवासी भी आये.उनसे अचानकमुलाक़ात हो गई. तैलंग को संन्यासी रूप में देखकरसभी चकित रहगए.सभी नेआग्रह किया कीश्मसान कीकुटिया में चलकररहे. सौतेली माँका देहावसान हो चूका था. श्रीधरभी बूढ़े हो चले थे. गजानंदसरस्वती नेकहा-“ मैं गुरुदेव कीआज्ञा से तीर्थयात्रा पर निकला हूँ. मेरे लिएगाँव जाना संभव नहींहै.“ इतना कहकरगजानन सरस्वती आगे बढ़ गए.मेलेमें बहुत लोग थे. लोगों की अपारभीड़ थी. अचानक देखा तो एक मृत व्यक्ति को लोग तख्ती पर बाँधरहेथे. महिलाएं रो रही थी. परिवारजन उदास था.इतने मेंगजानन सरस्वती बोले-“ अरे जीवित व्यक्तीको क्यों बाँध रहेहो.“ सुनकर सबका रोना पीटना रुक गया, आश्चर्य सेदेखने लगेकि क्यों संन्यासी महाराज मृत व्यक्ति को जीवित बोल रहेहैं. साधू परविश्वास होने से लोगों ने स्वामी को जगहदी. स्वामी नेकमंडल से जल लेकर छिडका और मृत व्यक्ति कफ़न के भीतरछटपटाने लगा.लोगों नेतुरंत रस्सी काट डाली. स्वामी जी ने कहा-“चिंता कीबात नहीं थोडा दूधपिला दो.“ देखते ही देखतेयेसमाचारबिजली कीतरहसब ओरफ़ैल गया.नागरिकों और तीर्थयात्रियों कीभीड़दर्शन को टूटपड़ी. आप उसी रात को वहां सेरवाना हो गए. कई नगरों में भ्रमण करते स्वामी शिवकांची पहुंचे. वहां एक ब्राह्मणउनके पास आया औरप्रणाम किया. स्वामी नेपूछा – हाँकहो क्या बात है. ब्राह्मण बोला- स्वामीजी मैंने आपको पहचान लिया है. आप वही सेतुबंध वाले महात्मा हैं जिन्होंने मृत को जीवित करदिया था.कृपया मेरे घर चलकर मेरी सेवा ग्रहणकरें. स्वामी जी ने सोचा- अजीबमुसीबत मेंफंस गएअब कातरब्राह्मण का अनुरोध कैसे ठुकरायें. स्थान मनोरम औरनिर्जन था.स्वामीजी ने कुछ समयवहीँ रुकने का निर्णयलिया. काफीसमयतक ब्राह्मणऔरउसकीपत्नी उनकीसेवा मेंलगी रही. एक दिन स्वामीजी बोले- मैं देख रहा हूँकि तुम मेरी सेवा किसी स्वार्थको लेकर कर रहो हो. क्या कष्ट है. कहो. बड़े विनयके साथ ब्राह्मणबोला- महाराज हम अपुत्रक हैं, और घरमें क्या स्थिति हैआपसे छिपा नहींहै.याचक ब्राह्मण ठहरा.कृपा करके आप मुझेपुत्र धनकीप्राप्ती का आशीर्वाददें. स्वामीजी के शुभाशीष से ब्राह्मणके यहाँ एक पुत्रहुआ.राज्य कीओरसे उसे आय लायक भूमि प्राप्तहो गयी.ब्राह्मणका भला होता देख करऔरगांववालेभी स्वामीजी को तंग करने लगे. साधना में व्याघात होते देख एक दिन गजानंदजी वहां सेअंतर्धानहो गए.यहाँसेचलकरस्वामी जी नेनिश्चयकिया कि ऐसेस्थान पर जाता हूँजहां कोई परिचित न मिले. ऐसा विचार कर वेनेपाल कि ओर प्रस्थान कर गए.वहां एक निर्जन जंगल मेंउन्होंने आसन जमाया. कहा जाता हैकि नेपाल नरेश को शिकारका शौक था. एक बार शेर का पीछा करते हुएवेजंगल के उस स्थानके नजदीक पहुँचगएजहांस्वामी विराजमान थे.गोली चलाई औरगोली चूक गयी. अब शेरको ढूँढा जानेलगा.अचानक से राजा देखते हैंशेरपालतू बिल्ली कीतरहस्वामी जी के पैरों के पास बैठहै.नरेश औरअन्यशिकारियों को देखतेही गुर्राने लगा. इतना खूंखार शेर स्वामी के पास कैसे ऐसे बैठा है?? स्वामी जी ने शांत भाव सेकहा-“ इससेडरने कीजरुरत नहींहै, जब तक मैंनहींकहूंगा यहयहाँ सेहिलेगा नहीं.जिस शेर का आप शिकार करने को निकले उसे यहाँदेखकर भयभीतक्यों हो रहेहैं.जब आप किसी को प्राणदेनहींसकते तो लेनेका अधिकारकहां से आया औरकिसने दिया.? हिंसा उचित नहींहै, आप जाएँराजन.“ कुछदेरबादशेरवापिस जंगल में चला गया.इधरराजा महल में आकरविचारमें पड़ गएकि कैसे एक खूंखार शेर एक संतके सामने पालतूबिल्ली बनकरबैठा रहा.दुसरे दिन अनेक उपहारलेकरस्वामी के निकट उपस्थित हुए. स्वामी मुस्कुराते हुए बोले.-“राजन मैंइन उपहारों का क्या करूं गा. आप इन्हेंअभावग्रस्तलोगों मेंबटवा दीजिये. “ नेपाल नरेश के उपहारों को ठुकराने कीकहानी सैनिकों द्वारा जन मेंफैलते देरनहींलगी.लोगों कीभीड़ स्वामी तक उस निर्जन वन तक पहुचने लगी. फलतः एक रातस्वामी तिब्बत कीओरनिकल पड़े. कुछ समयतक तिब्बत औरबादमें मानसरोवरपरयोगाभ्यास करते रहे.सन १७२६ई.को आप अचानक नर्मदा नदी के किनारे स्थित मार्कंडेयऋषि के आश्रम में आकर साधनारत हो गए.यहाँभारत के अनेक संत महात्मा रहते थे.उनसेयोग, दर्शन, अध्यात्म कीचर्चा करते रहे. यहाँ का वातावरण स्वामीजी को इतना पसंदआया कीयहीं कुटिया बना कररहनेलगे. नित्यनर्मदा में स्नान के पश्चात योगाभ्यास करते थे.कहा जाता हैकि इसी आश्रम में “खाकीबाबा“ करके एक संत रहते थे.वे भी नित्ययोगाभ्यास करते थे.एकदिन जब वे नदी किनारे बैठे अभ्यास कररहेथे तब सहसा उनकीनजर नर्मदा के जल परपड़ी.उन्होंने चकित दृष्टि से देखा- नदी का जल श्याम वर्णनहींहै, बल्कि दूधकी तरहहै. इससे अधिक आश्चर्य कीबात यह हुई कि स्वामी गजानंदउस दूध को अंजलि मेंभरकर पान कर रहे हैं. देर तक वे इस दृश्य को देखतेरहे.एकाएक उनके मनमें आया कि कहींदृष्टिभ्रम तो नहींहै. यहसोचकरवेनदी किनारे आये और अपनी अंजलि में नर्मदा में प्रवाहित दूध को उठाया तो वह पानी नजर आया. दूर गजानन स्वामी को देखा तो वहजा चुके थे. और इधर नदी का स्वरुप वास्तविक रूप में परिणित हो चूका था. उन्हें समझतेदेरनहींलगी कि स्वामी गजानंदने अपनी यौगिक शक्ति के माध्यम से ये चमत्कारदिखाया है, खाकी बाबा अभी इस स्तर परनहींपहुंचे थे.इसलिएउन्हेंआश्चर्य हुआ.इस घटना के कारण सेस्थानीयसभी संत उन्हेंऔर श्रद्धा कीदृष्टि सेदेखने लगे. सात वर्षों तक मार्कंडेयऋषि के आश्रम में रहने के बादपुनः एक बारयात्रा को स्वामीजी निकल पड़े. विभिन्न तीर्थों के दर्शनकरतेहुएसन १७३३ई.के अंतिम दिनों में प्रयाग में आकररहनेलगे.यहाँ एक नदी के किनारे एक निर्जनस्थान पर आकरसाधनारत हो गए.एक दिननदी के किनारे चुपचाप बैठे थे.मौसम अच्छा ही था अबतक.पर अचानक से ही बरसात होने लगे हवा चलने लगी बिजली चमकने लगी. किनारे का बालू उड़ कर दूसरी ओरजाने लगा. नदी किनारे खुले में जो लोग बैठे थे वे आश्रयकीखोजमें तुरंत इधरउधरदौड़ने लगे.स्वामीजी निश्छल बैठे रहे.अब एक स्वामीजी को जानता था.रामतरण भट्टाचार्य. वो स्वामीजी को बोला-“महाराजआप क्यों इस बारिश में भीग रहेहैं. चलिएकिसी दुकानमें आश्रयलेते हैं.“ स्वामी बोले-“ मेरी चिंता मत करो तुम जाओ. मैंकिसी विशेष काम से बैठा हूँ.“ “देखो उस पारसे एक नाव आएगी यात्रियों को लेकर. वह थोड़ी देरमें डूब जायेगी.मुझे उन लोगों को बचाना है.“ इतनी देरमें रामतरणदेखता है सचमुचएक नाव आ रही है और लहरों के कारण सेझकोलेखा रही है.लेकिननाव क्यों डूब जाएगी और स्वामीजी कैसे बचायेंगे, ये समझमें नहीं आया.कौतुहलवश वो भी वहीँरुक गया. अब देखता है की स्वामीजी अपनी जगहसे गायब हैं.थोडा डरसा गया.अब देखता हैकि सही में नाव डूबनेलगे. लोग हल्ला मचाने लगे, चीखपुकार मचने लगी. तभी देखा कीनावडूबने कीस्थिति में होने परभी किनारे परआकर लग गयी. यात्री लोग भयभीतथे परकेवल कपडे औरसामान थोडा गीला था, और एक कोने मेंउलंग स्थितिमें स्वामी बैठे थे.येकैसेहुआ कि स्वामी बात करते करते नाव पर पहुँचगए. रामतरणको कुछ समझ में नहींआया. यात्रियों के चले जाने के बादरामतरणने स्वामीजी के पाऊँ पकड़ लिए.और अपनी भक्ति का निवेदन किया. वहचमत्कृत था. प्रयाग चार वर्षतक निवास करनेके बादस्वामीजी का आगमन काशी नगरी में हुआ.बचपन में उन्होंनेजहांगीरको किशोरावस्था मेंदेखा, शाहजहाँ को भारतीयसंस्कृतिऔर धर्म परकुठाराघात करते देखा औरवृद्धावस्था में औरंगजेब के धार्मिक उन्मादको देखने लगे. काशी नगरी मेंबिंदुमाधव और विश्वनाथ मंदिरध्वस्त करदिया गया था.नगरकीजनता आतंकित औरसंकटापन्नथी.ठीक ऐसेमाहौल मेंपूज्यपाद गजानन सरस्वती का अवतरणकाशी में हुआ. प्राचीनकाल से काशी में अनेक संत महात्मा रहतेआयें हैं, पर वेयवनों के प्रकोप तो दूर करने मेंअसमर्थरहे.काशी आकर स्वामीजी ने नगरके बाहरी इलाके मेंस्थित लोलार्क कुंडपर डेरा डाला. नदी किनारे प्रायः चुपचाप ध्यान करतेथे. गंगा स्नान करनेवालेइन्हें देखकर, दूरसेप्रणाम करते और कुछ उपेक्षा के साथ आगेबढ़ जाते.(उपेक्षा के साथ, अनादर के साथ नहीं….) कभी कभी आसपास के लोग स्वामीजी के निकट आतेऔर जानकारी हांसिल करते.इस तरहलोगों ने जाना कि स्वामीजी तेलंगाना से आयेहैं, अस्तु धीरे धीरे वेतैलंग स्वामी के नाम सेपरिचितहुए.कम ही लोगों को उनके असली नाम <> की जानकारी थी. सांवला रंग, नग्न देह, कमरमें कोपीन, मुंडित मस्तक, उन्नत ललाट और भरपूर शरीर था तैलंग स्वामी का.एक बारआप लोलार्क कुंड में स्नान करने के बादजब ऊपर आयेतो देखा एक कुष्ट रोग से पीड़ित एक व्यक्ति गली में नाली के पास बेहोश पड़ा है, करुणा से विगलितहोकरआप उसके निकट बैठगए. उसके शरीरपरधीरे धीरे हाथ फेरनेलगे.स्वामीजी के स्पर्श सेउसकीचेतना जागृत हुई. स्वामीजी नेपूछा-“बड़ा कष्ट है“ “हाँबाबा मैं मरने के लिएही काशी आया हूँ, भोलेनाथ मुझे मुक्ति देदेंतो इस पाप सेछुटकारा मिल जाए. पता नहींकिस पाप कीसजा भोग रहा हूँ.“ स्वामीजी ने पूछा-“क्या नाम हैतुम्हारा.?“ कुष्ट रोगी नेकहा-“ ब्रह्मा सिंह.अजमेरसे यहाँ आया हूँ इसलिएकि मुझे सदा के लिएमुक्ति मिल जाए.पता नहीं भगवान् मेरी प्रार्थना कब स्वीकार करेगा“ स्वामीजी ने कहा-“ चिंता मत करो.जाओ, कुंड में स्नान करके आओ.स्नान करनेके बादये पत्तेचबा करखा जाना. तुम्हारा रोगदूरहो जाएगा.औरदेखो अच्छा होनेपर भगवान् का भजन करते रहना.में पास के घाट पररहता हूँ, रोजआकर बेलपत्रले जाना.“ स्वामीजी कीआज्ञानुसारब्रह्मसिंहरोजस्वामीजी के पास से बेलपत्रलेता औरखा लेता.कुछही दिनों में वहरोगमुक्त हो गया.इसी कारण सेवहस्वामीजी कीसेवा में रहगया. इसी प्रकारसीतानाथ बनर्जीनमक एक बंगाली युवक एक अरसे सेतपेदिक से पीड़ित था. उसे ये विश्वास था कि वहचंद दिनों का मेहमान है. सुखपूर्वक रहने के लिएवहगंगातटपर आकररहनेलगा.एकदिन उसकीहालतचिंताजनक हो गयी.देखते देखतेदर्शकों कीभीड़ इकठ्ठी हो गयी. ठीक इसी समयन जानेकिधरसे तैलंग स्वामी वहांआ गए.यहाँइतनी भीड़देखकर पूछा कि क्या बात है, प्रश्न पूछनेपर जब उन्हें कारणमालूम हुआ तो उन्होंने कहा.-“ज़रा आप लोग हट जाईये.“ स्वामी जी रोगी के पास बैठकरउसकीछाती सहलाने लगे. इसके बादउसे सहारा देकरबैठातेहुएकहा-“ चिंता की बात नहींहै, सब ठीक हो जाएगा.“ घाट के किनारे सेथोड़ी मिटटी लाकरउसे देतेहुएस्वामीजी नेकहा-“इसमेंथोड़ी खा लो, शेष मिटटी प्रलेप कीतरह अपनी छाती पर लगा लेना.कल सेनित्यगंगा स्नान के बाद यही क्रिया करना.कुछदिनों बादतुम्हारा रोग दूरहो जायेगा.“ करुणा स्वरुप शिव साक्षात् तैलंग स्वामी के स्नेह कृपा उपचार सेवह ठीक हो गया. कुछदिनों बाद स्वामी जी भदैनी घाटसे हटकर हनुमानघाट पर आकररहने लगे. घाट किनारे बैठनेसे भक्तगणआ जाते और कुछ उपदेश दे देते. यहींइसी मोहल्ले मेंएक महिला रहती थी. वहनित्यगंगा स्नान को जाया करती थी.औरवहांसे विश्वनाथ के दर्शन को. एक दिन स्वामीजी पूर्ण रूप सेदिगंबर नंग धडंग बैठे थे.इन्हेंवस्त्र रहित देखकरवह महिला आग बबूला हो गयी. कुछदूरजाकरराह चलते लोगों से कहने लगी-“शर्मनहीं आती इस बूढ़े को, सरे आम नंगा बैठा है, औरतों का चलना दूभरहो गया है“ स्वामीजी अपनी आलोचना मौन भाव से सुनते रहे. प्रतिवाद में उन्होंने कुछ नहींकहा. वहमहिला भुनभुनाती हुई वहां से चली गयी. इसी रात उस महिला ने एक भयंकरस्वप्न देखा- स्वयं भगवान् शंकरउसेफटकारते हुएबोले-“तुनेआजही मेरे एक गण का अपमान किया है, अब तेरी मनोकामना पूरी नहीं होगी. मेरे गण का अपमान मेरा ही अपमान है.अब वही गण तुझेअपने कष्टों से छुटकारा दिलवाएगा. मैंकुछनहीं करूँ गा.“ स्वप्नमें ये निर्देश चेतावनी सुनते ही महिला जागगयी. एकाएक उसेध्यान आया कि उसनेएक नंगे साधूको फटकारा था.ओहो कैसी गलती हुई. सुबहस्नान करके तुरंत वहतैलंग स्वामी के पास चरणों में गिरपड़ी-“ भगवन कल मुझसे अपराध हो गया.मुझे क्षमा करदीजिये.मैं बड़ी अभागिन हूँ. आपको पहचान नहींसकी.आप दयालु हैं, जब तक आप क्षमा नहींकरेंगे मैं नहींजाउंगी.“ अन्तर्यामी बाबा से बातछुपी नहींरही. शांतस्वरमें उन्होंने कहा-“माँतू चिंता मत कर. तू मेरी माँहै.माँका कार्य है ही-बेटे को डांटना.मैं तो उस घटना को भूल चुका हूँ, तूभी भूल जा. बाबा के दरबारमें तू अपने पतिको निरोग बनाने जाती रही है न? चिंता मत कर, वहठीक हो जाएगा.पूर्व जन्म का कुछ भोग बाकीहै.ले, इस भस्म से कुछखिला देना और शेष उसके पेटमें मल देना.वहनिरोग हो जाएगा.“ कुछदिनों मेंउसका पति भला चंगा हो गया. ये चमत्कार देखकरवह स्त्री बाबा कीपूजा साक्षात् विग्रहकीतरह करने लगी.उसकीजबानी इस घटना का प्रचारचारों ओरहो गया. फलस्वरुप कष्टपीड़ित औरबीमारलोग बाबा के पास आने लगे. भोलेनाथ कीतरहसभी लोगों को बाबा आशीर्वादके साथ साथ भभूत देते रहे.इसी प्रकार बाबा के यौगिक ऐश्वर्य का प्रसार होने लगा. पर बढ़ती भीड़ सेपरेशान होकर स्वामी जी वहांसे हटकर दशाश्वमेघ घाट परआकर रहने लगे.आपकीअलौकिक शक्ति का प्रचारहो चुका था.लोगों का ताँता लगनेलगा.श्रद्धालु अपनी स्वार्थ सिद्धी के लिए मिठाई, वस्त्रआदिसामानलाने लगे. तंग आकरअपने मौन धारण करलिया. अब किसी के प्रश्न का उत्तरदेने के बदले ध्यानस्थ हो जातेथे. भेंट में जो कोई कुछलाता, उसे स्वीकारकर लेते औरफिरलोगों में बाँट देते थे. एक बारएक शरारती व्यक्ति अपने मन कीइच्छा पूरी करने रोजआने लगा.इधरआशुतोष स्वरुप स्वामी जी का मौन व्रत.कोई जवाब नहीं देते थे.इस कारणसे उस व्यक्तीके मन में द्वेष हो गया.एक दिन वहहंडिया में चुने का घोल मिला करलाया औरस्वामीजी को कहा-“मैं आपके लिए लिएघर का गाढा दूधलाया हूँ. “ उसका सोचना था कि स्वामीजी पियेंगेऔरजब चूना पेटमें जायेगेतो दर्दसे अपनेआप मौन व्रत टूटजाएगा.फिर देखता हूँस्वामीजी कैसे नहींबोलते. स्वामी जी अन्तर्यामी, उस निर्बुद्धी का दिया चूनेका घोल पी गए. स्वामीजी को तो पता ही था.अब निकटही स्वामी जी नेलघुशंका करके चूना अलग निकाल दिया. उस व्यक्ति ने स्वामी को अपनी ओर तीक्ष्णदृष्टि से देखतेपाया तो मन में भयहुआ कि अरे चूना तो निकल गया. डरसे भाग खडा हुआ. रात को उस व्यक्ति कीहालत चिंतनीयहो उठी.पेट दर्दसे वो छटपटाने लगा.दुसरे दिन सुबह के समयही स्वामीजी के पास पहुंचा औरपैरों मेंगिर पड़ा.आशुतोष स्वामी उसके सर पर हाथ फेरने लगे.थोड़ी देर मेंपीड़ा कम हो गयी.उसने कहा- “मुझे अपनेअपराध कीसजा मिल गयी, महाराज. कृपा बनी रहे.“ दशाश्वमेघ घाट परअधिक भीड़ होने से स्वामीजी पंचगंगा घाट पर चले गए.यहाँ बिंदुमाधव मंदिर के पास आकररहने लगे. इसके बादआजीवन आप यहींरहे.यहींआपकी अधिकतर लीलाएंहुईं. गंगा के उस पारकाशी नरेश का क्षेत्रथा औरइस पारब्रिटिश शासनकीहुकूमत थी.उनदिनों काशी का जिलाधीश अँगरेज़ था.जब उसकी अदालत में स्वामीजी बंदी बना करलाये गए तब उसने कहा-“ इस तरहनंगा रहना अपराध है. मैंजानता हूँकि अधिकाँश संत नंगेबदन रहतेहैं.पर इस तरहखुलेआम दिगंबररूप में रहना कानूननअपराध है.भविष्यमेंआप धोती या अन्यकोई वस्त्र पहनें.“ अचानक जजकीनिगाह स्वामीजी पर पड़ी उसने देखा कि मेरी आज्ञा पर ध्यान देनेके बजायबंदी दूसरी ओरदेखरहा है. अपनी उपेक्षा उसे सहन नहींहुई. तुरंत आदेश दिया-“इस साधू को पकड़ कर जेल मेंबंद करदो.“ आदेश का पालन करने पोलिस आगे बढ़ी.अचानक बाबा भरी अदालतसेगायब हो गए.पकड़तेकिसको.? भरी अदालत हक्की बक्कीरहगयी.स्वामीजी को गिरफ्तारकरलिया है सुनकर वैसेही भारी भीड़ जमा थी. अब बाबा के गायब होते ही भक्त औरदर्शक हर्षसे चिल्ला उठे.<> <> के स्वरसेअदालत गुंजायमान हो उठी. जिलाधीश औरअन्यकर्मचारियों कीस्थिति अब विचित्र सी हो गयी. चारों ओरखोजनेपर भी बाबा नहींदिखे. ठीक इसी समयमेंअदालतमें एक बंगाली सज्जन आये जो इसी कचहरी में मजिस्ट्रेट थे.सारी बातें सुनने के बादउन्होंने जिलाधीश से कहा-“भारत मेंअनेक साधूनिर्वस्त्र रहतेहैं. उनकीइस आदत को कोई बुरा नहींमानता. फिरतैलंग स्वामी साधारणसाधूनहींहैं.सिद्धपुरुष हैं. “ बात समाप्त होते ही स्वामीजी फिर उस कठघरे मेंदिखायी पड़े.बंगाली बाबुनेकहा-“ इनके लिएवास भवन और कारागार सामानहै. क्रोध हिंसा घृणा भयआदिसे ऊपरउठ चुके हैं.चन्दन और बिष्ठा मेंअंतर नहींसमझते.आप इसे समझें.“ अब अँगरेज़जजको बाबा कीइतनी प्रशंशा अच्छी नहींलगी. उसेलगा कीधर्मोन्मादमें भारतीयपागल हैं.उसनेजानबूझ करस्वामीजी कीओर देखतेहुएकहा.-“ क्या येफकीरमेरे यहाँ भोजन करसकता है?“ जिलाधीश अँगरेज़था.अँगरेज़सुवर गो का मांस खातेहैं.उसे इस बात कीजानकारी थी कि हिन्दूगोमांस नहींखाते.फिर संततो कोई मांस नहीं खाते. स्वामीजी ने जिलाधीश के मनकीबातको समझते हुएकहा- “ठीक हैजरूर खा सकतेहैं, परउसके पहलेआपको मेरा भोजन खाना पड़ेगा.“ जिलाधीश को पता था साधू संत तो फल मिष्ठान्नखाते हैं. बोला-“ लाईये देखूंतो आप…..“ अभी बात पूरी भी नहींहुई कि स्वामीजी ने अपनेहाथ मेंटट्टी करके जिलाधीश के मुहके आगे कर दी.<> साहब कीहालतऐसी हो गयी जैसे कटे को खून नहीं.घृणा से उसने नाक मुहसिकोड़ लिया. उसे देखकरआश्चर्यहुआ कि बिना किसी दुराग्रहके भरी अदालतमें स्वामीजी नेटट्टी को उदरस्थकरलिया. स्वामीजी का प्रभाव अब पूरी तरहपड़ चुका था.उसने स्वविवेक सेफैसला दिया कि स्वामीजी किसी भी स्थिति में कहीं भी आने जाने को स्वतन्त्र हैं. कहा जाता हैकि इस घटना के बादएकदूसरा जिलाधीश बनारस मेंआया.पंचगंगा घाट परकुछ अँगरेज़टहलनेगए. साथ में महिलाएंथीं.इनकीनजरनिर्वस्त्र तैलंग स्वामी पर पड़ी.उन्हें बड़ा नागवारलगा.जिलाधीश सेशिकायत की गयी.उसनेतुरंत स्वामीजी जो गिरफ्तार करने का आदेश दे दिया. स्वामीजी गिरफ्तारहोकरठाणेमें बंदहो गए.शहरमें सनसनी फ़ैल गयी. कहींजनता के विरोधपर कहींपोलिस उस साधू को छोड़ न देइस बात कीजांच करने स्वयं जिलाधीश जेल में पहुंचा. पर देखा तो पाया कि स्वामी जी तो जेल कीकोठारी के बाहरघूम रहे हैं. सिपाहियों कीलापरवाही सेनाराज होकरवहसभी पर बिगड़ने लगा.पहरेदारों नेकहा-“हुजूरहम लापरवाहनहीं हैं. स्वयं अपनी आँखों सेदेख लें. डबल ताला बंदहै.हमनेतो अन्दर बंदकिया था.पता नहींबाबा कैसे बाहरनिकल गए. ? हम पकड़ने जाते हैंतो गायबहो जातेहैं.कभी इधरतो कभी उधरदिखाई पड़ते हैं.“ जिलाधीश को पहरेदारों कीबातें मनगढ़ंतलगीं.खुदताला टटोल करदेखा. फिरदेखा की कमरे में पानी भरा है.अजीब बूआ रही है.बड़ा अजीब दृश्यथा. जिलाधीश ने पूछा-“ हवालात मेंइतना पानी कैसे आ गया? “ पहरेदारके बदले स्वामीजी बोले-“रातको लघुशंका लगी तो थोडा करदिया.उस समयबाहरनिकलने कीइच्छा नहीं थी और भोरमें टहलने कीइच्छा हो गयी. पहरेदारों ने मुझे नहींनिकाला.“ जिलाधीश को स्वामीजी कीबातों परविश्वास नहींहुआ. सभी सिपाही हिन्दूहैंजिनकीसाधुओं परआस्था रहती है. जरुरयेलोग झूठबोल रहेहैं.उसनेतुरंत आदेश दिया कि मेरे सामने बाबा को हवालात में बंदकरो.देखूं तो कैसे बाहर आता है.“ स्वामीजी को पुनः हवालात मेंबंदकरदिया. उसी दिन जिलाधीश अपनी इजलास मेंएक मुकदमे की बहस को सुन रहा था. अचानक उसने देखा कि कमरे के एक कोने मसे स्वामीजी निकलकर सामने आकरखड़ेहो गए.पूर्ण रूप से दिगंबरथे. उसेहक्का बक्का देखकर स्वामीजी नेकहा-“ पश्चिम के नास्तिक भारतीययोगियों के बारे मेंजानतेही क्या हैं.?तुम लोगों मेंइतनी शक्तीनहींकि मुझे बंदकरके रख सको. भविष्यमें किसी संत के साथ ऐसा व्यवहारमत करना वरना उनके कोप से बच नहींपाओगे.“ स्वामीजी ने आगे उसे कितनी चेतावनी दी यहसारी बातें सुनने के पहलेही वह इजलास पर बेहोश हो गया. चारों तरफ तहलका मचगया.स्वामीजी अंतर्धान हो गए. होश मेंआने परउसनेफैसला दिया कि काशी के सर्वजन आदृत स्वामी तैलंग जी नगरमें , कहींभी, किसी भी रूप में रहने को स्वतंत्रहैं. उनके साथशासन कीओर से कभी छेड़छाड़ नहींकीजाये. जयमहात्माओंकीअनोखी लीलाओं की…..भारत भूमि धन्य है



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